गंगा दषहरा 2015

गंगा दषहरा 2015

हर वर्ष ज्येष्ठ माह की षुक्ल पक्ष की दषमी को गंगा दषहरा मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 28 मई 2015 को मनाया जाएगा। स्कंदपुराण के अनुसार इस दिन व्यक्ति को किसी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान, एवं दान करना चाहिए। इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी पवित्र नदी पर नहीं जा सकता तो ऐसे में वह अपने निवास स्थान के समीप किसी नदी पर स्नान कर सकता है।
ज्येष्ठ षुक्ल पक्ष की दषमी को संवत्सर का मुख कहा जाता है। इस कारण इस दिन दान एवं स्नान का महत्व अत्याधिक है। वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ षुक्ल दषमी, बुधवार के दिन हस्त नक्षत्र में माॅं गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी। इस पवित्र नदी के जल से स्नान करने पर इस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं।

गंगा दशहरे का महत्व

भागीरथ की तपस्या के बाद जब माॅं गंगा धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ षुक्ल पक्ष की दषमी थी। गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन ही गंगा दषहरा मनाया जाता है। इस दिन लोग ब्रहम मुहूर्त में उठकर गंगा नदी में खड़े होकर गंगा स्तोत्र पढ़ते हैं। ऐसा करने वाला अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। स्कंद पुराण में दषहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है।

इस पवित्र दिन जिस भी चीज का दान करें उसकी संख्या दस होनी चाहिए तथा जिस वस्तु से पूतन करें उसकी संख्या भी दस होनी चाहिए। ऐसा करने से लाभदायक फल की प्राप्ति होती है तथा षुभ कार्यों में वृद्धि होती है।

गंगा दशहरे का फल

ज्येष्ठ षुक्ल दषमी के दिन गंगा स्नान करने वाले भक्तों का दस प्रकार का पाप नष्ट होता है तथा उन्हें दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, तीन पाप मानसिक एवं चार पाप वाचिक होते हैं। इस सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।

पूजा विधि

इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति वहाॅं तक जाने में असमर्थ है तो अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा माॅं का ध्यान करते हुए स्नान कर सकता है। गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडषोपचार से पूना करनी चाहिए तथा निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए:-

“ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः”

इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का उचारण पाॅंच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भागीरथ के नाम मंत्र से पूतन करना चाहिए। इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए। गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति पूजन के पष्चात दान करना चाहता है तो वह भी दस प्रकार की वस्तुओं को होना चाहिए। परन्तु यदि जौ एवं तिल का दान कर रहे हैं तो सोलह मुठ्टी का होना चाहिए। दक्षिणा भी दस ब्राहम्णों को देनी चाहिए तथा दस बार गंगा में डुबकी लगानी चाहिए।

गंगा जी की कथा

इस दिन सुबह स्नान, दान तथा पूजन के उपरांत कथा भी सुनी जाती है जो इस प्रकार से है –

प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर थे। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। एक बार सगर महाराज ने अश्वमेघ यज्ञ करने की सोची और अश्वमेघ यज्ञ के घोडे को छोड़ दिया। राजा इन्द्र यह यज्ञ असफल करना चाहते थे और उन्होंने अश्वमेघ का घोड़ा महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम में पहुंचे और घोड़े को देखते ही चोर-चोर चिल्लाने लगे. इससे महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई और जैसे ही उन्होंने अपने नेत्र खोले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा। सभी जलकर भस्म हो गये।

राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और फिर महाराज दिलीप तीनों ने मृतात्माओं की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि वह गंगा को धरती पर ला सकें किन्तु सफल नहीं हो पाए और अपने प्राण त्याग दिए. गंगा को इसलिए लाना पड़ रहा था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी नहीं बची थी।

महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की और एक दिन ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और भगीरथ को वर मांगने के लिए कहा तब भगीरथ ने गंगा जी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही जिससे वह अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति कर सकें। ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा को तुम्हारे साथ भेज तो दूंगा लेकिन उसके अति तीव्र वेग को सहन करेगा? इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की शरण लेनी चाहिए वही तुम्हारी मदद करेगें।

अब भगीरथ भगवान शिव की तपस्या एक टांग पर खड़े होकर करते हैं। भगवान शिव भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं। गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड देते हैं। इस प्रकार से गंगा के पानी से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल होता है।

May, 26 2015 07:58 am