कजरी तीज का महत्व

कजरी तीज भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन का प्रतीक है। इस साल यह पर्व 01 सितम्बर 2015 को देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। खास बात यह है की इस साल कजरी तीज एवं गणेश चतुर्थी का आयोजन एक ही दिन हो रहा है।

क्यों है इस साल की कजरी तीज खास?

अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मनाया जाने वाला पर्व – कजरी तीज इस साल उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में पड़ रही है तथा साथ ही यह तीज चतुर्थीयुक्त भी है। वैदिक शास्त्रों में चतुर्थी युक्त तथा उत्तरा-भाद्रपद और पूर्वा-भाद्रपद की तृतीया को बहुत ही खास एवं षुभ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इन दोनों स्थितियों में तीज का व्रत करने पर स्त्रियों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है।

कजरी तीज व्रत करने की विधि –

पति के दीर्घायु और मनचाहे वर के लिए स्त्रियाॅं निम्न कार्य करें:-

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें तथा पूजा पाठ करें।
  2. भगवान शंकर और पार्वती की पूजा फल, फूल, नैवेद्य, धूप और दीप के साथ करें।
  3. सुयोग्य वर के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप करें –
    हे गौरी षंकर अर्धांगिनी यथा त्वं षंकर प्रिया।
    तथा मम कुरू कल्याणी कान्त कान्ता सुदुर्लभम्।।
  4. सास, ननद और बड़ों के पैर छूकर आषीर्वाद लें।
  5. पूरे दिन निर्जला व्रत रखें।
  6. प्रसाद के रूप् में चावल, सत्तू, घी, मेवा और फल लें और सुहाग का सामान लेवें।
  7. व्रत के अगले दिन सुहाग का समान किसी गरीब स्त्री को दान करें।
  8. दान के बाद सबसे पहले प्रसाद ग्रहण करें, उसके बाद ही पारण करें।

तीज का मुहूर्त

तृतिया तिथि आरम्भ – 31 अगस्त 2015 षाम 4ः50 बजे
तृतिया तिथि समाप्त – 01 सितम्बर 2015 दोपहर 1ः23 बजे

क्या है कजरी तीज?

कजरी तीज को बूढ़ी तीज तथा सातूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम कजरी तीज आसमान में घूमते काले बादलों के कारण रखा गया था। इस दिन महिलाएँ जौ, गेहूँ और चने के सत्तू में घी, मेवा डालकर पकवान बनाती हैं। इसलिए इसे ‘सातूड़ी’ तीज भी कहा जाता है। कजरी तीज को विशेष रूप से बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। इस अवसर पर महिलाएँ विरह, प्रेम और मिलन की गीत गाती हैं।

कजरी तीज का महत्व

यह मान्यता है कि देवी पार्वती ने 107 जन्मों तक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। तब 108वें जन्म में देवी की तपस्या से खुष होकर भगवान शंकर ने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

इसके बाद से ही ‘कजरी तीज’ मनाने की परम्परा शुरू हुई। तीज का त्योंहार महिलाओं के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए महिलाएँ इस व्रत का निर्वाह करती हैं। इस दिन भगवान शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को कंवारी कन्या और सुहागिन महिलाएँ दोनों बराबर रूप से कर सकती हैं। कंवारी कन्याएँ अपने मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए तथा सुहागिन महिलाएँ पति की दीर्घायु और अपने सुहाग की रक्षा के लिए इस व्रत को करती हैं।

Sep, 01 2015 08:21 am