महाषिवरात्रि पर चार प्रहर पूजन का विधान

महाशिवरात्रि पर चार प्रहर पूजन का विधान

भगवान शिव को हिन्दू संस्कृति का प्रणेता माना जाता है। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में षिव ही अलौकिक षक्ति के देव हैं। महाषिवरात्रि का पर्व भगवान षिवषंकर के तांडव नृत्य का महापर्व है।

शिव का अर्थ है कल्याण एवं दानार्थक धातु से रात्रि बना है जिसका अर्थ है सुख प्रदान करने वाला। अर्थात शिवरात्रि का अर्थ है वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है तथा जिसका षिव के साथ विषेष संबंध है।

ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान षिव की भक्ति, दर्षन एवं व्रत पूजा नहीं रखता वह सांसारिक मोह माया के बंधन से मुक्त नहीं हो पाता है। पुराणों में बताया गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में निरर्थक नहीं जाता है।

shivratri pooja शिवरात्रि पूजन

शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर षिव मंदिर जाकर आएॅं। वहाॅं षिवलिंग का पूजन करें। गीता में कहा गया है कि:-

या निषां सर्वभूतानां तस्या जागृर्ति संयंमी।

यस्यां जागृति भूतानि सा निषा पश्चतो सुनेः।।

अर्थात विषयों से युक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं तथा जहाॅं षिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भांग आदि अर्पित कर भगवान षिव का जप व्रत करते हुए एकाकर होना ही षिवपूजा है।

4 prahar pooja चार प्रहर चार पूजा

महाशिवरात्रि में चारों प्रहर में अलग अलग विधि से पूजा का प्रावधान है। पहले प्रहर में भगवान षिव की ईषान मूर्ति को दूध द्वारा स्नान कराएॅं। दूसरे प्रहर में भगवान शिव की अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएॅं तथा तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएॅं। अंतिम प्रहर में षहद से स्नान कराना चाहिए। ऐसा करने से भगवान शिव अतिप्रसन्न हो जाते हैं।

शिव की पूजा करते समय ऊॅं नमः शिवय का जप करें तथा महादेव का ध्यान लगाएॅं। शिवरात्रि के दिन शिव को बादाम, कमल पुष्प, अफीम बीज एवं धतुरे का पुष्प तथा बिल्वपत्र चढ़ाना बहुत ही षुभ माना गया है।

महाशिवरात्रि पर अद्भुत संयोग

देषभर में महाशिवरात्रि का पर्व श्रद्धा-भक्ति एवं उत्साह से साथ मनाया जा रहा है।

64_012

महाशिवरात्रि को भगवान भोलेनाथ का विवाद हुआ था। इस दिन भक्तजन भगवान शिवका अभिषेक कर बिल्व पत्र तथा पुष्प आदि चढ़ाकर उनकी अराधना कर सकते हैं। ऐसा माना गया है कि इस दिन पितृदोष, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए भी पूजन किया जाता है। कृष्णपक्ष की चतुर्दषी तिथि की रात चंद्रमा की षक्ति क्षीण हो जाती है। भगवान षिव की पूजा से मानसिक बल की भी प्राप्ति होती है।

mahashivratri night jagaran महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण

शिवभक्तों के लिए षिव की आराधना का सबसे बड़ा पर्वशिवरात्रि पर्व है। इस पर्व को मनाने के तीन नियम है जिन्हें तीन स्तम्ब भी कहा जाता है। यह इस प्रकार हैं:- उपवास, षिव पूजन तथा रात्रि जागरण

शिवरात्रि पर शिव के भक्तों को यह तीन कार्य करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। भक्तगण वत्रादि विधिपूर्वक करते हैं परन्तु रात्रि जागरण एवं रात्रि कालीन चार प्रहर की पूजा नहीं करते हैं जिसके कारण उन्हें शिव पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है।

अतः प्रयास करें की रात्रि जागरण एवं चारों प्रहर की पूजा अवष्य करें।

पूजा विधान 

महाशिवरात्रि को सूर्यास्त से पूर्व स्नान करें। षोडषो उपचार की सामग्री एकत्रित कर भगवानशिव का पूजन करें। साथ ही रुद्रष्टाध्यायी के मंत्रों से अभिषेक करें। रुद्र कवच, दारिद्र दहन स्तोत्र, षिव तांडव स्तोत्र, शिव महिमा स्तोत्र, पषुपति स्तोत्र आदि का उच्चारण कर शिव जी का जलाभिषेक करें।

यदि ऐसा करने में आप असमर्थ हैं तो भगवान षिव के षडक्षर मंत्र ‘‘ऊॅं नमः षिवाय’’ या महा मत्र्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग का अभिषेक करें। प्रत्येक प्रहर के अंत में षिव पूजन एवं आरती करें तथा ग्यारह बिल्व पत्र भी अर्पित करने चाहिए।

महाशिवरात्रि पर कैसे करें भोलेनाथ को प्रसन्न

शिवरात्रि भगवान शिव के रुद्र रुप में अवतरण तथा विवाह का दिन है। इस दिन शिव भक्तों को षिव की आराधना कर सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह भक्तों के लिए बड़ा पर्व है। फाल्गुन कृष्ण चर्तुदषी को शिवरात्रि मनाई जाती है।

ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान षंकर का ब्रहमा से रुद्र रुप में अवतरण हुआ था। इसी दिन प्रदोष के समय भगवानशिव तांडव करते हुए ब्रहमांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसलिए इसे महाषिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहते हैं।

इस दिनशिवभक्त मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते हैं तथा उनका पूजन करते हैं एवं उपवास रखते हैं। भक्त रात्रि में जागरण भी करते हैं। चतुर्दषी तिथि के स्वामी षिव हैं। ज्योतिष षास्त्र में इसे षुभदायी तिथि कहा गया है। शिवरात्रि हर माह ही आती है परन्तु फाल्गुन चतुर्दषी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।

ज्योतिष गणित के अनुसार चतुर्दषी को चन्द्रमा अपनी क्षीण अवस्था में पहुॅंच जाते हैं। इस कारण चन्द्रमा षक्तिहीन हो जाता है। चन्द्रमा का संबंध सीधे मन से होता है। मन कमजोर होने के कारण भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। चंद्रमा महादेव के मस्तक पर सुषोभित है। अतः चंद्रदेव की कृपा पाने के लिए भगवान षिव का आश्रय लिया जाता है।

शिवरात्रि के दिन जो भी श्रद्धा से उपवास रखता है वह शिवको परमप्रिय है। पूरे दिन उपवास रखना लाभदायक होगा। इस वर्ष लगातार तीन दिनों पर पितृ पूजा, कालसर्प पूजा एवं भगवान शिव की पूजा का विषेष महत्व रहेगा।

shiv pooja ऐसे करेंशिव पूजन

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प एवं भांग अत्याधिक प्रिय है। जल सेशिवजी का अभिषेक करें। पूजा के लिए दूध, दही, घी, षक्कर, षहद इन पाॅंचामृत से स्नान कराएॅं। प्रसाद के रुप में भांग का भोग लगाएॅं। महा मृत्युंजय मंत्र षिव आराधना का महामंत्र है। षिव को प्रसन्न करने के लिए पंचाक्षर मंत्र ‘ऊॅं नमः षिवाय’ का भी जप करें।

click here for mahashivratri pooja

षिवरात्रि नित्य एवं काम्य

शिवरात्रि नित्य इसलिए है क्योंकि यदि मनुष्य इसे नहीं करता तो वह षुभ फल से वंचित हो जाता है तथा सहस्त्र जन्मों तक भ्रमित रहता है। यह व्रत काम्य इसलिए है क्योंकि इस व्रत को करने से फल प्राप्ति होती है।

Story of mahashvratri महाशिवरात्रि व्रत की कथा

एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण वह समय पर ना चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की।

शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता ना चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मुझे मार लेना।’’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाडि़यों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया।

तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘‘हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका।

वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।’’

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।’’

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब ना करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख ना सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से वह अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।’’

उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई।

उस मृग परिवार को ना मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

click here for mahashivratri pooja

Mar, 06 2016 01:49 pm