Importence of adhik mass

अधिकमास का महत्व

Importance Of Adhik Maas

पं. लक्ष्मीकांत जागीरदार –

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सौरवर्ष एवं चंद्रवर्ष सर्वाधिक माने गये हैं। एक सौरवर्ष में लगभग 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट होते हैं। जबकि एक चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन 8 घण्टे, 48 मिनट होते हैं। इस प्रकार एक चंद्रवर्ष में तथा सौरवर्ष में लगभग 11 दिन का अंतर आ जाता है। भारतवर्ष में सौर व चंद्र वर्ष दोनों ही माने जाते हैं। अतः इन 11 दिनों के अंतर को समायोजन करने के लिये चंद्र वर्ष के महीनों में वृद्धि या क्षय कर लिया जाता है। यदि वृद्धि होती है तो वह महीना अधिक मास कहलाता है एवं इसके विपरीत यदि क्षय होता है तो वह महीना क्षय मास कहलाता है।लगभग 32 माह प्श्चात् एक चंद्रमास बढ़ा दिया जाता है। इसलिये प्रत्येक 2 1/2 स 3 वर्ष के पश्चात् एक अधिक मास होता है। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपक्ष, अश्विन मास अधिक मास हो सकते हैं। इसके विपरीत चंद्रमास के दो पक्षों में जब दो संक्रांति होती है, उसे क्षय मास कहते हैं। क्षय मास वाले वर्ष में दो अधिक मास आते हैं। अर्थात् क्षय मास से पहले और बाद में एक एक अधिक मास होता है। क्षय मास 141 वर्ष के अंतराल पर आता है। किंतु कभी कभी जिस वर्ष क्षय मास होत है। उसके 19 वर्षों पश्चात् पुनः क्षय मास हो सकता है।

पुरूषोत्तम मास की कथा:- Story of Purushottam Mas – Mal Maas in Hindi

अधिक मास को मलमास भी कहा जाता है। मलमास का कोई स्वामी नहीं था तब इस मास की घोर उपेक्षा व निंदा होती थी। अतः अपनी व्यथा से व्याकुल होकर मलमास जगत के पालन हार श्रीहरि विष्णु के सम्मुख गया व भगवान को अपनी व्यथा सुनाई व कहा – हे दीन वत्सल! मैं आपका शरणगत हूँ, कृप्या मेरी चिंता दूर कीजिये। मैं मलमास एक ऐसा अभागा हूं कि जिसका ना कोई नाम है ना स्वामी और ना ही आश्रय है। सभी मेरा तिरस्कार करते हैं। मलमास की व्यथा सुनकर भगवान विष्णु बोले – हे वत्स! तुम्हारा यह दुख भगवान श्रीकृष्ण हील दूर कर सकते हैं अतः मेरे साथ भगवान के धाम गौलोक को चलो। गौलोक पहुंचने पर भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण की स्तुति की। प्रसन्न होकर

श्रीकृष्ण को जगत के पालन हार को स्वर्ण के सिंहासन पर बिठाया। मलमास भी श्रीकृष्ण के चरणों में गिर गया। मलमास की यह दशा देखकर भगवान कृष्ण बोले – हे प्रभु! यह कौन है? जो मेरे चरणों में रूदन कर रहा है। तब भगवान विष्णु बोले- हे मुरलीधर! यह मलमास है। सूर्य संक्रमण से रहित हो जाने के कारण् यह मलिन हो चुका है। इसका ना तो स्वामी है ना कोई नाम है। वनस्पतियों, लताओं, अयनों, संवत्सर कलाओं आदि ने इसकी घोर निंदा की है। इसके दुखों का निवारण आप ही कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बोले- हे विष्णु! आप ने मलमास को लाकर महान उपकार किया है। अब यह मलमास मेरे लिये सर्व प्रिय हो गया है। जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मैं पुरूषोत्तम नाम से विख्यात हूँ, उसी पव्रकार यह मलमास भी भू-तल पर ‘‘परूषोत्तम मास‘‘ के नाम से प्रसिद्ध होगा। मैं स्वयं इस मास का स्वामी व देवता हो गया हूँ। जो भक्त इस अधिकमास में श्रृद्धा भक्ति के साथ जप, तन, व्रत, उपवास, पूजा, दान आदि शुभ कर्म करेगा। उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण होगी और मृत्यु के पश्चात् वह गौलोक में जायेगा। इस प्रकार श्रीकष्ृण से वरदान पाकर अधिकमास ‘‘पुरूषोत्तम मास‘‘ के नाम से विख्यात हो गया।

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अधिकमास का फल:- Why we celebrate Adhik Mas

What we should to do in Ashik Month 2015

महर्षि वाल्मिकी ने पुरूषोत्तम मास के नियमामे ंके संबंध में कहा है कि इस माह में गेहूं, चावल, सफेद केला, घी, कटहल, आम, जीरा, सौंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक, आदि हविष्यान्न भोजन करना चाहिये। सभी प्रकार के मांस शहद, उड़द, राई, नशे की चीजें, दाल, तिल का तेल व दूषित अन्न का त्याग करना चाहिये। किसी प्राणी से द्रोह नहीं करना चाहिये। देवता, वेद ब्राह्मण, गुरू, गाय, साधु, सन्यासी की निंदा नहीं करनी चाहिये। पर स्त्री को सेवन ना करें। पुरूषोत्तम मास में जमीन पर सोना, पत्तल में भोजन करना व शाम को एक वक्त खाना खाना चाहिये। प्याज, लहसून, नागरमोथा, गाजर, मूली, इत्यादि का त्याग करना चाहिये। कहा गया है कि – यह पुरूषोत्तम मास निष्काम होगा अर्थात् इस माह में किये गये कार्य, पूजा, अर्चना का फल भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त होगा।

गौलोक में पहुंचने के लिये जिस प्रकार महर्षि वाल्मिकी कठोर तपस्या में रत रहते हैं वहीं दुर्लभ पुरूषोत्तम मास में स्नान पूजा आदि निष्काम कर्म करने वाले भक्तों को सुगमता से प्राप्त होगा। जो भी पुरूष या स्त्री इस माह में जब, तप, व्रत, दान करेंगे उन्हें सारे दुःखों से, रोग, शोक, दरिद्रता, अपराध नष्ट होकर सद्गति प्रापत होगी। अतएव हम कह सकते हैं कि अधिकमास में भगवान के स्मरण मात्र से ही सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं।

अधिकमास में जो भी जप, तप, व्रत या दान किया जाता है वह 33 दिनों का होता है। इस मास के 33 वे दिन पीतल या कांसे की थाली में 33 छिद्र युक्त खाद्य पदार्थ रखकर दान किया जाता है। जैसे – अनारसा, पतासे, मालपुआ, घेवर। सौरवर्ष या चंद्रवर्ष में 11 दिन का अंतर होता है। अतः 3 वर्ष के पश्चात् यह 33 दिन हो जाते हैं। इसलिये अधिकमास में 33 खाद्य पदार्थों को या 33 व्रत करने की परंपरा है।

अधिकमास के देवता:- God of Adhik Mas

शास्त्रानुसार पुरूषोत्तमास के 33 देवता कहे गये हैं। 1. विष्णु 2. महाविष्णु 3. जिष्णु 4. हरि 5. कृष्ण 6. अघेक्षज 7. केषव 8. माधव 9 राम 10 अच्युत 11. पुरूषोत्तम 12 गोविंद 13. वामन 14. श्रीध 15. श्रीकांत 16. विष्वसाक्षी 17 नारायण 18. मधुरिम 19. अनिरूद्ध 20.त्री विक्रम 21. वासुदेव 22. जय दयोनी 23. अनंत 24. शेषषायी 25. संकर्षण 26. प्रद्युम्न 27. दैत्यारी 28. विष्वतोमुख 29. जनार्दन 30. धरावास 31. दमोदर 32. अर्धाजन 33. श्रीपति

अधिकमास में क्या करें?:-

संध्या, नित्यकर्म, गौसेवा, चान्द्रायण व्रत, श्रीमद्भागवत पाठ, तुलसीपत्र से शालीग्राम पूजन, प्राणघातक रोग से बचाव हेतु जाप, कपिल षष्ठी व्रत, तीर्थ गमन, श्राद्ध, तर्पण, ग्रहण का दान, पुंसवन-सीमांत-गर्भादान-चुड़ाकर्म आदि संस्कार भजन श्रवण कीर्तन, संत सेवा, मंदिर दर्षन, वेद अध्ययन, अन्न प्राशन, विधवा-अनाज-असहाय लोगों की निष्काम भाव से सेवा, जौ-तिल-भूमि-गौ-सुवर्ण व ताम्र का दान आदि। इसके अलावा निष्काम पूजा अर्चना को अधिकामस में विशेषरूप से स्वीकार किया गया है।

अधिकमास में क्या ना करें?:- What we should to do and do not in Adhik Month 2015

बावड़ी, बगीचा, गृहवाटिका, नलकूप, बोरिंग का निर्माण गृहारंभ, गृहप्रवेश, व्रत का प्रारंभ व उद्यापन, वधु प्रवेश, सोमयाग, जलशाला का निर्माण, मूर्ति स्थापन व प्रतिष्ठा मंत्र ग्रहण, विवाह-उपनयन-मुण्डन आदि संस्कार, संयास, राज्याभिषेक, समावर्तन, कर्णदेव, नामकरण, दिव्य कर्म, मंगल कार्य, शुभकार्य, व्यापार आरंभ साथ ही किसी विशेष कामना के लिये की जाने वाली पूजा, साधना, अर्चना या अनुष्ठान नहीं करना चाहिये।

अधिकमास की प्राचनी कथा:- Story about Adhik Mas Month

प्राचीनकाल में दानव राज हिरण्कश्यप् ने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। फलस्वरूप ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर हिरणकश्यप से कहा – हम तुम्हारे तप से अति प्रसन्न हैं, मांगो! तुम्हें क्या वरदान चाहिये? हिरण्कश्यन ने कहा – यदि आप मुझे वरदान देना चाहते हैं तो ऐसा वरदान दें कि ना दिन में, ना रात में, ना अस्त्र से ना शस्त्र से, ना नर से ना पशु से, ना घर के अंदर ना घर के बाहर और ना ही आपकी सृष्टि के किसी भी देव, दानव, गंधर्व, स्त्री या पुरूष से और ना ही इन बाहर महीनों में से किसी मास में मेरी मृत्यु हो।

ब्रह्माजी ने तथास्तु कह कर वरदान दे दिया। इस वरदान को पाकर हिरणकश्यप अपने आप को अमर समझकर अत्यधिक अत्याचार करने लगा। तीनों लोकों में उसका राज्य चलने लगा। तब देवताओं ने ब्रह्माजी के साथ बैठकर चिंतन किया व इस चिंता के निवारण के लिये जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु के पास गये। बहुत सोच विचार करने के बाद भगवान विष्णु ने कहा कि इन बारह महीनों में इसकी मृत्यु नहीं हो सकती। अतएव इस वरदान को क्षय करने के लिये भगवान ने अधिकमास (पुरूषोत्तम मास) का निर्माण किया। तब जाकर भगवान विष्णु ने अधिकमास में नृसिंह अवतार लेकर हिरणकश्यम का वध किया।

 

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Mar, 31 2015 01:41 pm